गुरुवार, 20 नवंबर 2008

ग़ज़ल : यादगारें छोड़ते जाओ

रोशनी बनकर पिघलता है उजाले के लिए
शम्अ जल जाती है घर को जगमगाने के लिए

हमने अपनों के लिए भी मूँद रक्खा है मकाँ
पेड़ की बाहें खुली हैं हर परिंदे के लिए

प्रेम हो, अपनत्व हो, सहयोग हो, सेवा भी हो
सिर्फ़ पैसा ही नहीं, हर बार जीने के लिए

जितने भी काँटे हैं पग-पग में वे चुनते जाइए
रास्ते को साफ़ रखना आने वाले के लिए

एक दिन जाना ही है, जाने से पहले दोस्तो
यादगारें छोड़ते जाओ, ज़माने के लिए

डा गिरिराजशरण अग्रवाल

4 टिप्‍पणियां:

swati ने कहा…

चुन चुन कर मोतियों से शब्दों से सजी ये रचना बहुत ही सुंदर बन पढ़ी है....बधाई

मनुज मेहता ने कहा…

मुंबई में जो कुछ हुआ उसके लिया बहुत दुखी हूँ. मन हल्का करने के लिए यहाँ चला आया हूँ.

आपकी रचना पढ़ी, रचना काफ़ी सशक्त है. मेरी बधाई स्वीकार करें

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जितने भी काँटे हैं पग-पग में वे चुनते जाइए
रास्ते को साफ़ रखना आने वाले के लिए

बहुत खूबसूरत लफ्ज़
खूबसूरत अंदाज़ , खूब सूरत ग़ज़ल

Anubhooti Bhatnagar ने कहा…

Papa vo gazal aur post karein jo aapne hamein likhker di thi